May 29, 2018

मौसम “आत्महत्याओं” का


                 Picture Courtesy- Internet


हमारे देश मे प्रत्येक शुभ कार्य का मौसम होता हैं | कम लोग जानते होंगे, कि हमारे यहाँ अशुभ कार्य का भी मौसम होता हैं| विगत कुछ वर्षो से देश मे एक नये मौसम का आगमन हुआ है| इस मौसम मे कोई विशेष प्रकार की फल या सब्जी तो नहीं होती, मगर आत्महत्याएँ होती हैं | ये मौसम आमतौर पर अप्रैल-मई मे आता हैं|हाँ कभी-कभी एक-दो हफ्ते आगे-पीछे हो जाता है| इस मौसम मे आत्महत्या करने वाले 14-18 उम्र के बच्चे शामिल होते हैं| आप शायद समझ ही गये होंगे, कि यहाँ बात देश मे 10वीं या 12वीं की परीक्षा परिणामों की जा रही हैं| आत्महत्या करने वालों मे वे बच्चे शामिल होते हैं,जो बोर्ड परीक्षाओं मे कम अंक पाने, सफल न होने और अभिभावकों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते| जिसके चलते उन्हें आत्महत्या की राह बहुत ही सुलभ प्रतीत होती हैं|

लांसेट की वर्ष 2012 मे प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत मे हर घंटे 15-29 आयु के छात्र कम अंक पाने, फैल हो जाने, प्रतियोगी परीक्षाओं मे असफल हो जाने पर आत्महत्या करते हैं| आधिकारिक आकड़ों के अनुसार,
2014-18 मे 26,476 छात्रों ने आत्महत्या की|

हाल ही मे लखनऊ के अलीगंज इलाके मे रहने वाली 10वीं की छात्रा ने 73 प्रतिशत अंक आने पर भी फाँसी लगा ली| क्योंकि छात्रा को मेरिट मे आने की उम्मीद थी,  पर कम अंक पाकर उसे बहुत धक्का लगा| घटनास्थल से एक पत्र मिला, जिसमे मेरिट की बात का जिक्र तो था ही, साथ ही पारिवारिक सहयोग के नहीं मिलने का जिक्र भी था|

परिणाम की घड़ी फिर चाहे वह किसी भी परीक्षा का परिणाम क्यों न हो, परीक्षार्थी को सहयोग की और साथ की जरूरत होती हैं| ताकि सफल होने पर कोई उसकी ख़ुशी मे शामिल हो या असफल होने पर उसके दुःख का भागीदार बन सके| परिणाम संतोषजनक न आने पर समाज ऐसी दृष्टि से देखता हैं, कि जैसे उसने कोई बहुत घिनौना अपराध कर दिया हो और यही से ज़िन्दगी के सारे रास्तें बंद हो गये| चंद अंक ही मानो जिंदगी-भर के लिए कलंक बन जाते हैं|

मौसम तो चल ही रहा बोर्ड परीक्षाओं का, तभी इसी मौसम का एक और दूसरा रूप भी देखने को मिला| हुआ यूँ मध्य-प्रदेश मे एक पिता ने अपने बेटे के फेल होने पर मिठाइयां बटवाई, ढोल-नगाड़े बजवाये और आतिशबाजी भी करवाई| बेटा फेल भी सिर्फ एक-दो विषयो मे नहीं हुआ था, बल्कि छह मे से चार विषयो मे फेल था| साथ ही साथ पिता ने बेटे को आगे आने वाले भविष्य के प्रति प्रोत्साहित किया और दोबारा परीक्षा देने के लिए बहुत मेहनत करने को कहा|

इस पर रानी लक्ष्मी बाई मेमोरियल स्कूल के 12वीं के एक छात्र ने बताया कि "मेहनत करके परीक्षा मे अच्छे अंक हासिल किये जा सकते हैं और खराब परिणाम आने पर आत्महत्या करना बिलकुल गलत हैं| जिंदगी होंगी तो सफल होने के कई अवसर मिलेंगे|"

लखीमपुरखीरी की विशुना सिंह तीन बच्चों की माँ ने बताया कि “अगर हमारा बच्चा फेल हो जाता हैं तो हम उसको दुत्कारेंगे नहीं, हाँ पर उसके फेल होने का अफ़सोस जताएंगे और आगे से और पढ़ाई करने के लिए समझायेंगे|
रही बात फेल होने पर बैंड बजवाने की और मिठाई बटवाने की तो ये हमसे नहीं हो पायेगा, कि असफलता की ख़ुशी मनाये| इतना बड़ा दिल हमारा नहीं हैं|”

मनोवैज्ञानिक डॉ प्रज्ञा वर्मा से हुई बातचीत मे उनका कहना हैं कि फेल-पास होना बच्चे की पूरे सत्र की पढ़ाई पर निर्भर करता हैं| जिसमें अभिभावकों और शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं| अभिभावको को बच्चों पर दबाव नहीं डालना चाहिए| हर अभिभावक यही चाहते हैं कि उनका बच्चा टॉप करें, लेकिन इसके साथ-साथ उन्हें ये भी समझना चाहिए कि क्या ये क्षमता हैं उनके बच्चे मे| परिणाम का डर, लोग क्या कहेंगे, रिश्तेदारों की बातें, और अभिभावकों के तानो इन सबका बहुत प्रभाव पढ़ता हैं बच्चों पर, जिसमें भी माता-पिता की अतुलनीय भूमिका होती हैं| ऐसी घड़ी मे माता-पिता को अपने बच्चों को समझना चाहिए और उन्हें समझाना चाहिए|उन्हें स्वयं के बारे मे सोचने का अवसर देना चाहिए और अपने विचारों को बच्चों पर नहीं थोंपना चाहिए| इनके अनुसार, मध्य-प्रदेश के वाक्या पर पिता ने अपने बेटे की मनोदशा के हिसाब से उसे समझा और ऐसा किया|

14-18 की उम्र मे बच्चों का सामाजिक विकास और दुनिया को समझने की शक्ति विकसित होने लगती हैं| इस दौरान उन्हें अच्छी परवरिश देना अभिभावकों का पहला कर्तव्य होता हैं| जिससे वे समाज को सकारात्मक नजरिये से देख सकें|
लखनऊ विश्वविद्यालय की पीएचडी शोध छात्रा  शिवांगी मिश्रा कहती हैं, कि आज-कल के वातावरण के मुताबिक बच्चों के लिए  माता-पिता का साथ होने बहुत जरुरी होता हैं| माता -पिता को बच्चों का समर्थन करना चाहिये, प्यार के साथ-साथ सख्ती भी बरतनी चाहिये| उन्हें बचपन से ही प्रेरणावर्धक और उत्साहवर्धक बातें बतानी चाहिए|

अंको की होड़ मे आज-कल बच्चे सीखना भूलते जा रहे हैं|  वे सिर्फ परीक्षा के लिए ही पढ़ते हैं खुद के ज्ञान के लिए नहीं| किताबी कीड़ा बनाने से सर्वाधिक अंको को तो हासिल किया जा सकता हैं, पर भौतिक रूप से शिक्षित होने पर ही काबिल बना जा सकता हैं|

विद्या की देवी “सरस्वती” जिन्हे “बुद्धि की देवी” कहा जाता हैं, उन्हें भी आज “अंको के तराजू” मे तौला जा रहा हैं| शिक्षा भी अब गेहूं, चावल, दाल की तरह अंको मे मापी जाती हैं|
अगर यही चलता रहा तो, अगले वर्ष फिर ऐसा मौसम आएगा| आइये हम-सब प्रार्थना करें की ऐसा मौसम कभी न आये|

विदुषी मिश्रा 

20 comments:

  1. Failure is a key to success.

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  2. gd story. you have touched upon a true but neglected issue.

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  3. Well written Vidushi Mishra... 👌👌👌👍👍👍👍 Keep it up the good work if revealing reality.

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  4. This article shows the present scenario which is needed to be rectified ..!! Very Good Vidushi ..keep it up

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  5. Very well description of the suicide season. I don't know why parents give their children so much pressure for marks. Every one is different. U can evaluate the skills of fish because she won't climb the tree.

    Very well written and appreciate you for this. Well done I would like to read more.

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  6. This comment has been removed by the author.

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  7. Sure man.....you will....
    We will keep writing on such type of untouched issued....thanks for your motivation....

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