April 8, 2020

मेरा हमसफ़र


हया पलकों में सिमटी हो, 
भ्रमर अधरों का प्यासा हो ।
आनन पर मद्धम तेज हो ठहरा, 
प्रकाशित सुर्ख़ सुबह सा हो ।।

सादगी का नूर स्वाभाविक हो, 
समर्पित हो वह सीता सी ।
सरलता से जो समझा जाए, 
हो पवित्र ग्रंथ वह 'गीता' सी ।।

ईश्वर की कथित कहानी वो,
निर्मल गंगा का पानी हो ।
हो त्याग की मूरत राधा सी,
मीरा जैसी दिवानी हो ।।

उमड़ते सागर धारा जैसे वो, 
चंचल शोख़ हवा सा हो ।
उज्जवल संकेत हो नियति का,
वो प्रीति की परिभाषा हो ।।


स्तंभ हो विकट घड़ी में,
नाजुक पल में कोमल डाली हो ।
चौखट जिसके वो पांव रखें,
घर आंगन में खुशहाली हो ।।

वो दिव्य रूप जो देखें वो, 
फिर बिन देखे ना सो पाए ।
हो अद्भुत,अलख,अनोखा, 
वो जिसका वर्णन ना हो पाए ।।

मयंक कुमार श्रीवास्तव, 
शिक्षक, 
जिला बलिया, उत्तर प्रदेश, भारत।।




कवि का संक्षिप्त परिचय :-
मयंक कुमार श्रीवास्तव , एक शिक्षक है, मगर लेखनी इनकी भी चलती है, श्रृंगार रस के लिए। ये कविता उन्होंने कोविड 19 वायरस के चलते लॉक डॉउन में लिखी है । जिसे उन्होंने अपने होने वाले हमसफ़र को समर्पित किया है ।
©MayankSrivastava

 बच्चो को ज्ञान का पाठ पढ़ाते है , श्रीकृष्ण की तरह, गीता के अनुसार कर्म करना भी जानते है, और इस क्षणिक जीवन का लुत्फ़ उठाना भी । 


स्वप्निल रस्तोगी, 
devtales.co.in


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7 comments:

  1. Wha wha kya baat ha.. Bhai mera...

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  2. सुन्दर भविष्य
    इंतजार मेँ
    पलक पावड़े
    अदृश्य प्यार में

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