Ad

अरदास

गया है रूठकर हमसे तुम्हारे घर बुला लेना,
थका होगा अगर लेकर के बांहों में सुला लेना,
उसे आदत है जगकर नींद में मां को ढूंढने की, 
तो ले जाकर के इक तस्वीर तुम सिरहाने लगा देना।
मेरे आंगन का है आलोक तुम्हारे पास जा रहा है,
ओ रब, रखना उसे महफूज़ वो हम सब का दुलारा है।


अभी कांधे से उतरा है अभी चलना तो सीखा है,
उसे मालूम क्या दुनियां में जीने का तरीका है,
निरुपम - नैन के डेरे पे ख्वाबों का बसेरा हैं,
विमल - विश्वास संग धारों के बहने का सलीका है।
फ़लक के अर्श पर करता वो झिलमिल इक सितारा है,
ओ रब, रखना उसे महफूज़ वो हम सब का सहारा है।



बहुत ख़ुदग़र्ज़ है वो खुशियों के चंद पन्ने दिखाता है,
कि बदले में वो गम की हर किताबों को छुपाता है,
कोई समझे उसे अपना फिकर रहती नहीं उसको,
वो तो गैरों से भी बढ़कर के अपनापन निभाता है।
ये उसके बिन पड़ा फीका यहां का हर नज़ारा हैं,
जो कुछ दिन से है वो सूना शहर उसको बुला रहा है।



व्यथा इस पीर की जाकर मैं अब किसको सुनाऊंगा,
अश्क अंतर्मन में ठहरा उसे कैसे बहाऊंगा,
लगी जो तीर सीने पर वो खुद घायल हो बैठी है,
कहां जाकर मैं जख्म अपना भला किसको दिखाऊंगा।
निवेदक है पिता उसका जो फरियादें सुना रहा है,
मेरे जीवन का राशि अब तेरे हिस्से में जा रहा है।
ज़रा रखना उसे महफूज़ वो हम सब का दुलारा है।
                                        
                                         
© मयंक श्रीवास्तव

3 comments:

Did you like my blog post? Please Comment below.

Powered by Blogger.