Ad

SOCIAL & CULTURAL


NAUTANKI;A DYING FOLK
Once the most prominent source of entertainment for the people, especially in the villages in the northern part of India, ‘Nautanki’, a folk operatic theater performance, lost its sheen so much so that the term is now widely used more as a slang. The amalgamation of vulgarity and obscenity presented on stage has poisoned 'Nautanki and it is now a dying art.
Makkhan Srivastava former 'Nautanki player,who acted almost 100s of ‘nautankies’ and observed it closely, says that it's the world's only folk, in which singing takes place before the rhythm is played. Rendering of Rajasthani 'Maad', Madhya pradeshsi' Allha', Bihari 'Videshiya' and other folks in nautanki shows the popularity it had with other states but now it finds hardly any takers.
Originated to vocalize mythological stories like Raja Harishchandra"',Mauradhwaja" and "Laila maznoo" presently it got defiled and reached at the pathetic level of Rampat Harami. Thus section of society treat nautanki as if it is porn so they hesitate to see it.
Historically evolved in Uttar Pradesh’s Hathras district ,merely as poetry with no space for prose, but soon after prose was added in it .In archaic times 'Nautanki embraced 150 different "chhandas " (classical compositions of poetry) on which it was played, now limited to three,as Doha, tabeel and Doad. There were two schools of Nautanki. One was situated in Hathras and other in Kanpur.In the first and foremost Nautanki school Hathras it was sung in different classical melodies as per public demand.Vocalists start their tune with 'maa' scale key of harmonium which is extremely difficult to do without mic than, there was no element of drama displayed in Hathrasi 'Nautanki' The Raga which was popular in Hathras was "dhrupad Dhamar" and " Nattharam Goad" and "Chunnilal pachasaa' were the envoy of the same, Chunnilal was named before "Puchasa" because he earn 50 rupees a month which was very high at that time. Kanpur school was influenced by the Parsi theater which included element of acting,costumes and women along with singing and the Parsi joker turned into 'Pissu' in Kanpuri nautanki.Before that women were not allowed to take part in it.First nautanki played in Kanpur was for the mill workers which was great entertainment for day long exhausted ones thus labours paved handsome amount.By seeing enthusiasm for the folk Trimohan,a renowned Nakkara player, established first 'Nautanki company' in  Kanpur and after sometime  "Gulaab Bai" was added to his team she was like icing on the cake for folk lovers.Later on she planted her own company and had won Padma award for her theatrical contribution.With entry of 'Pissu' in it, vulgarity took its first step, lines as "peeche lakdi dihis lagay age lahnga sulgat Jay" of Amrit Lal Nagar were became the part of the folk which boosted popularity drastically but it's piousness got smudged.
As the time passed indecency and bawdiness became a new fad and since then our folk started loosing audience as civilized societies boycotted going and organizing 'Nautanki.
A renowned 'Nautanki director Atamjeet Singh while answering about the present status of the folk,said ‘'Conventional 'Nautanki' has lost audience…it's singers are living marginalized life.. many of them already have already deserted it as it became difficult to make two ends meet ….only those, who are its diehard admirers, have been giving support to this heritage’.'

‘’It can be revived only if drastic changes are made….the young generation needs to be attracted to it…they have access to social media which could be vital to infuse life into dying folk, gathering Nautanki players making videos of real Nautanki would be the best way’’, he adds.
Vivek Singh Chauhan

हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक - नवाब वाजिद अली शाह


                   Image Courtesy- Internet

अवध के नवाबों का नाम जुबां पर आते ही जहन में एक हाथ में शराब लिए और दूसरी तरफ़ तवायफों की महफ़िल में डूबे चेहरे नज़र आते है लेकिन हकीकत इसके पूर्णतः विपरीत है | अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह के बारे में भी कई  लोगो की यही सोच है कि नवाब साहब नशे में चूर रहते थे और हसीनाओं में खोये रहते थे लेकिन यदि इतिहास उठाकर देखे तो पता चलता है की अवध के इस आखिरी नवाब के साथ हमने न्याय नहीं किया हैं |
नवाब वाजिद अली शाह एक कुशल शासक, संगीत प्रेमी, कलाकार, नर्तक और गायक भी थे | लखनऊ की कई इमारतें ऐसी है, जो स्थापत्य कला के प्रति उनके प्रेम को बयां करती है | उनके राज्य मे लोग शतरंज,ताश,गनीफा जैसे खेलों की ख़ुशी में डूबा रहता था | वैसे तो नवाब वाजिद अली शाह एक शिल्पकार, कलाकार और गायक आदि गुणों से परिपूर्ण थे मगर संगीत की दुनिया में उनका नाम अविस्मरणीय है | उनके दरबार में हर दिन संगीत का जलसा हुआ करता था तथा उन्हें  संगीत विधा 'ठुमरी'  के जन्मदाता के रूप में भी जाना जाता है |
साकी की नज़र साकी का करम
सौ बार हुई सौ बार हुआ
ये सारी खुदाई ये सारा जहाँ
मैख्वार हुई मैख्वार हुआ
जब दोनों तरफ़ से आग लगी
रज़ी व रज़ा  जलने के लिए
तब शमा उधर परवाना इधर
तैयार हुई तैयार हुआ |
नवाब वाजिद अली शाह को गजलें , कविताएं और शेर लिखने का भी शौक था तथा ये गजल भी उनकी ही लिखी हुई है | निर्देशक,समाजसेवी व कवि मुजफ्फ़र अली का भी यही कहना है कि वाजिद अली शाह एक ऐसे नवाब थे जिन्होंने शराब को कभी हाथ तक नही लगाया तथा वे पाँचों वक्त की नमाज़ अदा करते थे | उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया तथा "गंगा-जमुनी" तहजीब पर भी ज़ोर दिया था | बजरंग बली की शान में बड़े मंगल की परम्परा लखनऊ में उन्होंने ही शुरू की थी जो आज भी कायम है और हिन्दू - मुस्लिम एकता का प्रतीक है |
“मुझमे थोड़ी सी जगह भी नहीं नफरत के लिए,
मैं  तो हर वक्त मोहब्बत से भरा रहता हूँ|”
अवध के नवाब के लिए मिर्जा फैज़लअली की यह शायरी क्या खूब बैठती है | वाजिद अली शाह एक ऐसा मुस्लिम बादशाह था जो राधा - कृष्ण के प्रेम का दीवाना था और कभी - कभी खुद ही कृष्ण बनकर नृत्य करने लगता था | आज जब हिन्दू - मुस्लिम के बीच मजहबे-ए-दीवार खड़ी होती है तो अवध के आखिरी नवाब की याद आती है | 1847 में बने अवध के बादशाह वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने 1856 में झूठे आरोप लगाकर अवध से निकाल दिया था |
“बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए,
बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए |
चार कहर मिल मोरी डोलिया सजावे,
मोरा अपना बेगाना छूटो ही जाय |”
अपने साम्राज्य से अंग्रेजों द्वारा निकाले जाने पर उन्होंने यही प्रसिद्ध ठुमरी गीत गाकर अपनी रैयत से अलविदा ली | 15 जून 1857 में वाजिद अली शाह को कैदी बनाकर कोलकाता के फोर्ट विलियम में रखा गया | वहां कैदी के रूप में 26 महीने गुजारने के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया | अपने घर लखनऊ न लौट सकने की उम्मीद के साथ उन्होंने कोलकाता के मेटियाबुर्ज  क्षेत्र को छोटा लखनऊ बनाने में अपनी बाकी की उम्र लगा दी | वाजिद अली शाह ने वहां कई भव्य इमारतें मुरासा मंजिल, नूर मंजिल तथा अदालत मंजिल बनवाई और जल्द ही इमामबाडा और मस्जिदों का भी निर्माण कराया जिससे मेटियाबुर्ज ने धीरे-धीरे छोटे लखनऊ का रूप ले लिया | उन्होंने वहां चिड़ियाघर का भी निर्माण कराया, जो दुर्लभ जानवरों और पक्षियों का भी घर था | वाजिद अली शाह ने अपना जन्मस्थान व साम्राज्य "लखनऊ" को छोड़कर भी नहीं छोड़ा | कई कवि, संगीतकार और कलाकार मेतियाबुर्ज से आकर्षित होकर वहां आए तथा नवाब वाजिद अली शाह ने अपने 'छोटे लखनऊ' में उन सभी को शरण दी |1887 में वाजिद अली शाह की मृत्यु के पश्चात ब्रिटिश शासकों  ने उनके बनवाये हुए छोटे लखनऊ को तबाह करने की हर एक कोशिश की लेकिन उनके बनवाये हुए इमामबाड़ा  और मस्जिद आज भी वहां देखे जाते है |

हर्षिता शुक्ला


महिलाओं के स्वास्थ्य स्थिति का आँकलन 

January 24, 2019 

राष्ट्रीय बालिका दिवस-24 जनवरी 2015-16 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार शादी के बाद तक़रीबन 63 प्रतिशत मामलों में महिलाओं के स्वास्थ्य सम्बंधित समस्यायों बारे में निर्णय उनके पति या परिवार द्वारा लिया जाता है । मसलन उनको कौन सी दवा लेनी है ,डॉक्टर के पास कब जाना है यहाँ तक की उन्हें कब शारीरिक जाँच कराने की आवश्यकता है यह भी उनके पति या फिर परिवार के लोग ही बताते है । भारत निश्चित तौर पर वैश्विक मुखिया बन कर उभर रहा है लेकिन अब भी यहाँ महिलाओं के साथ बच्चों की स्वास्थ्य की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है । शिक्षा का बढ़ता स्तर जागरूकता को जरूर बढ़ा रहा है, बावजूद इसके दूर- दराज गाँवों में अब भी महिलाएं पृतसत्तात्मक सामाज के बोझ तले जीने को विवश है । वह स्वमं को एक स्वतंत्र प्राणी स्वीकार ना कर पति या परिवार के अधीनस्थ जीव मानती है जिनकी खुद की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है और ना ही स्वतंत्र रूप से वे अपने लिए कोई निर्णय लेने में सक्षम दिखाई देती हैं । हालांकि हालात पहले से बेहतर हो रहे है फिर भी कई ऐसे घर है जहाँ छोटे से बड़े निर्णयों में उनकी भागीदारी नगण्य होती है । ऐसे हालात सिर्फ गाँवों में नहीं है बल्कि बड़े शहरों में भी है और आश्चर्य की बात है कि बहुत से शिक्षित समझे जाने वाले परिवारों का हाल भी यही है । जहाँ महिलाओं को अपने न्यूनतम अधिकारों के लिए भी काफी संघर्ष करना पड़ता है । भारत मे स्वास्थ्य एक बहुत बड़ा और गंभीर मुद्दा है जिसपर ना तो आम लोग ज़्यादा ध्यान देते है और ना ही सरकार। बड़ी आबादी वाले इस देश में अभी भी स्वास्थ्य चुनावी या राजनितिक मुद्दा नहीं है । जबतक नागरिकों के बेहतर स्वास्थ्य की गैरंटी नहीं मिलती,तबतक हम चाहे भी तो बहुत आगे तक नहीं बढ़ सकते । अच्छा स्वास्थ्य समृद्धि और सफलता को काफी हद तक सुनिश्चित करता है । परंतु आजकल दिनोदिन नई बिमारियों का खतरा बढ़ता चला जा रहा है । आलम यह है कि बहुत सी ऐसी बीमारियों का प्रकोप बढ़ रहा है जिसका इलाज भी अभी संभव नहीं है । वैश्विक स्तर पर तापमान और बढ़ते प्रदूषण ने बीमारियों को एक सीमा से अधिक बढ़ा दिया है । जिससे आयेदिन नयी तरह की चुनौती को झेलना पड़ रहा है । दुनिया में जब हर स्तर पर साझेदारी बढ़ रही है तो ऐसे में बीमारियों में भी साझीदारीता का बढ़ना आम है । ऐसे माहौल में इस बात पर अब विशेष तवज़्ज़ो दिए जाने की जरुरत है कि हम विश्व भर में पनप रही बीमारियों से लड़ने में कितना सक्षम है ? नई जगहों पर नई बीमारियों की संभावनाओं से कितना सचेत है ? अनुसंधान,अन्वेषण और तकनीक के माध्यम से लोगों को बचा पाने में कहाँ तक सफल और समर्थ है ? एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में बीते सालों के मुताबिक क्लीनिकल ट्रायल अब कम हो रहे है । आपको बताते चले कि भारत की जनसँख्या भार विश्व की 17 प्रतिशत है और विश्व की 20 प्रतिशत बीमारियों का बोझ भारत झेल रहा है । भारत में सरकार द्वारा स्वास्थ्य सम्बंधित कई सारी योजनाएं चलायी जा रही है । मगर इन योजनाओं का लाभ उनतक नहीं पहुँच रहा जहाँ इसकी जरुरत है । अब तक की सबसे बड़ी हेल्थ स्किम आयुष्मान भारत के सामने भी अभी कई सारी चुनौतियां मौजूद है । बता दें कि खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2016 लागू होने के बावजूद यहाँ 14.5 प्रतिशत लोग भारत में कुपोषण के शिकार है । महिलाओं की स्वास्थ्य की हालत तो और भी गंभीर है। स्वास्थ्य मंत्रालय का आँकड़ा कहता है कि 53 प्रतिशत महिला रक्ताल्पता से पीड़ित है । बहुत सी गंभीर बीमारियों की व्यापक ज्ञान की कमी के चलते महिलाओं के स्वास्थ्य स्तर में गिरावट दर्ज की गयी है । ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि महिलाओं में ज्यादातर गृहणियां अपने स्वस्थ्य को लेकर कम जागरूक या फिर लापरवाह है । महिलाओं के स्वास्थ्य की बात करना इसलिये भी जरुरी है क्योंकि जब तक जननी स्वस्थ्य नही होगी, तबतक आने वाली संतानों को स्वस्थ् नहीं रखा जा सकता ? आधी आबादी का प्रदर्शन जबतक स्वास्थ्य के मामलों में बेहतर नही रहेगा, तबतक भारत को विकसित देश बनने का सपना छोड़ देना चाहिए । सिर्फ अर्थव्यवस्था और कुछेक रैंकिंग में अपनी बढ़त बना लेने मात्र से भारत की प्रगति की बात करना छलावा मात्र है । अच्छे स्वास्थ्य का सीधा लिंक जॉब और आर्थिक प्रगति से है जिसमें महिलाओं की भागीदारिता के बगैर विकास संभव नहीं है । स्वास्थ्य का असर सिर्फ जीवन प्रत्याशा या जन्म-मृत्यु दर के आँकड़े जानने के लिए ही जरुरी नहीं है बल्कि हमारी अर्थव्यवस्था का बढ़ना और बेहतर जीवनशैली भी इसीपर निर्भर है। किसी भी क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन हेतु शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान दिए जाने की जरुरत है । भारत में अब भी मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज किया जाता है । महिलाएं आज के समय में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक रोग और मानसिक प्रताड़ना की ज्यादा शिकार हो रही है । आंकड़े बताते है कि यौन हिंसा,घरेलु हिंसा और वैवाहिक हिंसा में इज़ाफ़ा दर्ज होने से महिलाओं की कार्यकुशलता एवं कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है । आज के भागदौड़ और तनावपूर्ण माहौल में ना सिर्फ शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य को ज्यादा तरज़ीह दिए जाने की जरुरत है बल्कि सरकार द्वारा भी ठोस स्वास्थ्य नीति और बीमारियों के प्रति जागरूकता फैलाने की जरूरत है । स्वस्थ्य को नज़रंदाज़ कर सरकार आर्थिक प्रगति का कोई लक्ष्य वास्तविकता में पूर्ण नहीं कर सकती । आज जरुरत है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में जीडीपी को एक प्रतिशत से बढ़ाया जाए । छोटे देश जैसे श्रीलंका स्वास्थ्य पर जीडीपी का 1.59% और थाईलैंड जहाँ जीडीपी का 2.89 प्रतिशत खर्च कर रहा है ऐसे में भारत को अपनी कमी को जल्द से जल्द सुधारना चाहिए और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना चाहिए । आज जैसे-जैसे पश्चिमी सभ्यता भारतीयों पर हावी हो रही है, वैसे-वैसे पुरुषों के साथ महिलाओं में भी शराब तथा सिग्रेट पीने का चलन बढ़ रहा है । साथ ही महिलाएं अब पहले से ज्यादा गंभीर बीमारियों जैसे एड्स,टीवी,कैंसर की शिकार हो रही है । ऐसे में यह एक नयी तरह की चुनौती बन रही है । क्योंकि ऐसी महिलाएं सामाजिक भय तथा दबाव के चलते ना तो खुलकर अपने बीमारियों या लतों के बारे में बता पाती है और ना ही समय पर अस्पताल ही पहुँच पाती है । ऐसे में उन्हें गंभीर बीमारियो से मुक्ति दिला पाना,अस्पताल या पुनर्वास केंद्र तक पहुँचा पाना चुनौती के साथ ही विकराल समस्या भी है । इसके अलावा स्वास्थ्य के क्षेत्र में महँगी दवाईयां, डॉक्टरों की कमी, स्वास्थ्य तकनीक एवं उपकरणों की कमी तथा अनुसंधान की कमी ने इस क्षेत्र में मुश्किलों को और भी बढ़ा दिया है । साथ ही आयेदिन डॉक्टरों की हड़ताल, सरकारी अस्पतालों में सुविधओं की कमी से हंगामा, डॉक्टरों में नैतिकता में गिरावट तथा बेहतर स्वास्थ्य नियंत्रक एवं नियामक संस्थाओं की कमी ने स्वास्थ्य स्तर को नीचले पायदान पर खिसका दिया है जिसपर विचार और उचित कार्वाही की तत्काल जरुरत है । शालिनी श्रीवास्तव मुक्त लेखिका व् रिसर्च एसोसिएट

No comments

Did you like my blog post? Please Comment below.

Powered by Blogger.